कब मिलेगा भुखमरी और गरीबी से निदान?

कब मिलेगा भुखमरी और गरीबी से निदान?
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विकास कुमार
आज 21 वी शताब्दी के दौर में पूंजी का केंद्रीकरण होता जा रहा है। इसके संचय के लिए आधुनिक मानव विविध प्रकार के सही गलत हथकंडे अपना रहा है। केवल एक ही उद्देश्य के लिए, पूंजी का संचय कैसे हो और कितना हो? एक ओर आबादी का कुछ हिस्सा विकास के सूचकांक में उन्नतोदर वृद्धि कर रहा है तो दूसरी ओर अवनति देखने को मिल रही है।

इस अवनति से विविध प्रकार के मानवीय मानसिकता को कुंठित करने वाली समस्याएं उत्पन्न हो रही है। जो वर्तमान समय की सर्वाधिक कठिन समस्याओं में से एक गरीबी और गरीबी का दूसरा आया भुखमरी। इसको पलट करके भी देखा जा सकता है भुखमरी से उत्पन्न गरीबी ।जैसे कहीं बात दोनों एक हैं। आज प्रत्येक देश हथियारों में एवं तकनीकों के विकास में अपने राष्ट्रीय आय का अधिकतम व्यय करता है। परंतु वहीं पर आधी से अधिक मानव जाति न्यूनतम सुविधाओं से भी वंचित हो रही है। उनकी यह आवश्यकताएं कब पूरी होंगी। इसका जवाब नाही लेखक के पास है और ना ही लेख पढऩे वालों के पास। तकनीकी प्रधान और आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित दुनिया में हम उन मूलभूत आवश्यकताओं को भूलते जा रहे हैं जो जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स के आंकड़े को सच माना जाए तो प्रतिदिन 3000 से अधिक बच्चे भूख से मर जाते हैं। इसका तात्पर्य हुआ की भूख से मरने वाले बच्चों का ग्लोबल इंडेक्स 23 प्रतिशत केवल भारत को ही दर्शाता है। भूख के मामलों में भारत की स्थिति नेपाल और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों से भी खराब है।

दुनिया भर में जहां करीब 5000000 बच्चे कुपोषण के चलते जान गवाते हैं। वही गरीब देशों  में 40 प्रतिशत बच्चे कमजोर शरीर और दिमाग के साथ बड़े होते हैं संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट यह दर्शाती है कि पचासी करोड़ 30 लाख लोग भुखमरी का शिकार है। इसमें केवल भारत का आंकड़ा देखा जाए तो लगभग 20 करोड़ से ज्यादा है। जबकि संयुक्त राष्ट्र संघ की विशिष्ट एजेंसी खाद्य एवं कृषि संगठन यानी एफएओ की एक रिपोर्ट बताती है कि रोजाना भारतीय 244 करोड़ रुपए यानी पूरे साल में 89060 करोड़ रुपए का भोजन बर्बाद कर देते हैं। इतनी रात में 20 करोड़ से कहीं अधिक भुखमरी से मरने वाले लोगों का पेट भर सकता है। कोरोनावायरस के बाद लोगों के कमाई के साधन बंद हो गए हैं जिसमें की कई परिवारों की मूलभूत आवश्यकताएं पूरी नहीं हो पा रही है। इस अवधारणा का शिक्षा पर भी प्रभाव देखने को मिला है क्योंकि जो परिवार भुखमरी और गरीबी के कलह से जूझ रहा है शिक्षा दिला पाना बच्चों को उसके लिए बड़ी बात हो जाती है। सतत विकास की अवधारणा ( 2015) के 15 बिंदुओं में मूलभूत शिक्षा, भुखमरी से निदान और गरीबी रेखा से ऊपर उठाने जैसे बिंदुओं को सम्मिलित किया गया है। क्या इन लक्ष्यों की पूर्ति ईमानदारी के साथ सरकारी मानक समय पर कर पाएंगी? यह प्रश्न भविष्य का है। जिसका उत्तर हमें अभी सुनिश्चित करना होगा। आज एक साधारण मनुष्य अपने परिवार को चला पाने में असमर्थ है। बेरोजगारी की मार और महंगाई उसके लिए नई कलर लेकर आती है। बड़ी-बड़ी कंपनियों से कर्मचारियों को निकाल दिया जाता है। रोजमर्रा की जिंदगी से जूझ रहे दैनिक मजदूरों को उनके प्रति दिन की मजदूरी नहीं दी जाती है। सरकारी योजनाओं में काम कर रहे गरीब मजदूरों को भी समय पर पैसा नहीं मिलता है।

सरकारी योजनाएं जो इन कार्यों के लिए क्रियान्वित की जाती हैं , उसका 60 प्रतिशत बीच के लोग खा जाते हैं। आवाज़ जैसे मूलभूत योजनाओं में भी ग्राम प्रधान या ग्राम सचिव का पैसा फिक्स रहता है। सरकार ने गरीबों के लिए अनाज की योजना चलाई वह भी उस व्यक्ति को आज नहीं मिल पा रहा है। वास्तव में उसका पात्र है क्योंकि राशन कार्ड ग्राम पंचायत स्तर पर उन्हीं लोगों का बन रहा है जिनकी पहुंच प्रधान तक है या फिर ब्लॉक स्तर तक है। एक गरीब आदमी जो प्रतिदिन मजदूरी करके या खेतों में काम करके अपना दैनिक जीवन चला रहा है उसको इन मूलभूत योजनाओं का भी लाभ नहीं मिल पाता है। आज गरीबी और भुखमरी का डाटा बढ़ता जा रहा है। इसमें सुधार कैसे लाया जाए? क्योंकि यह एक ऐसी गंभीर समस्या है जो वर्तमान पीढ़ी के साथ भावी पीढ़ी को भी विकलांग बना देती है। करोड़ों अरबों की परियोजनाएं आ करके खत्म हो जाती हैं उनका मूल्यांकन जमीनी स्तर पर होता ही नहीं है। कुछ पर योजनाएं तो क्रियान्वित होती हैं लेकिन वह जिनके लिए क्रियान्वित होती हैं उनको ही लाभ नहीं मिल पाता है। अगर ऐसी गंभीर समस्याओं से जल्द निदान नहीं मिला तो आने वाले समय के लिए यह घातक सिद्ध हो सकती हैं।
(लेखक- केंद्रीय विश्वविद्यालय अमरकंटक में रिसर्च स्कॉलर हैं एवं राजनीति विज्ञान में गोल्ड मेडलिस्ट है)

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