तीसरे कार्यकाल में शासन की निरंतरता बनी रहे

तीसरे कार्यकाल में शासन की निरंतरता बनी रहे
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अजीत द्विवेदी
नरेंद्र मोदी ने बतौर प्रधानमंत्री अपने तीसरे कार्यकाल में शासन की निरंतरता जारी रखी है। केंद्र सरकार के सभी अहम मंत्रालयों में पुराने मंत्रियों की वापसी हुई है। राजनाथ सिंह प्रतिरक्षा संभालते रहेंगे तो देश की आंतरिक सुरक्षा का जिम्मा अमित शाह के पास ही रहेगा। अगर वे अपना दूसरा कार्यकाल पूरा करते हैं तो यह एक रिकॉर्ड होगा क्योंकि देश में आज तक कोई भी नेता 10 साल तक गृह मंत्री नहीं रहा है। अर्थ नीति और विदेश नीति का जिम्मा क्रमश: निर्मला सीतारमण और एस जयशंकर के पास ही है और सडक़ परिवहन व राजमार्ग का जिम्मा नितिन गडकरी के पास है। शिक्षा के क्षेत्र में जो कुछ हो रहा है उसे चलाए रखने की जिम्मेदारी फिर से धर्मेंद्र प्रधान के ऊपर डाली गई है। कुल मिला कर देश की आर्थिक, सामरिक, सामाजिक नीतियों में कम से कम मंत्रियों के जरिए निरंतरता का संदेश दिया गया है।
पहले ऐसा लग रहा था कि लोकसभा के आंकड़े बदलने और नई राजनीतिक स्थितियां पैदा होने से सरकारी की संरचना में बदलाव आएगा। प्रधानमंत्री मोदी के लिए निरंतरता बनाए रखने में मुश्किल होगी। लेकिन उन्होंने नई स्थितियों में भी शासन का पुराना ढांचा बनाए रखा है। अपने अपने विभागों में पुराने मंत्रियों की वापसी से यह संदेश गया है कि भाजपा ने अपने चुनाव घोषणापत्र में नीतियों की जिस निरंतरता का वादा किया था उसमें कोई बदलाव नहीं आने वाला है।

ध्यान रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार कहते रहे हैं कि उन्होंने अपने कार्यकाल के पहले 10 साल में जो काम किया है वह ‘ट्रेलर’ है पूरी फिल्म बाकी है। चुनाव प्रचार में उन्होंने एक रूपक का इस्तेमाल किया और कहा कि उनका अब तक का कामकाज ‘स्टार्टर है, मेनकोर्स अभी बाकी है’। अगर त्रिशंकु लोकसभा की वजह से सरकार की संरचना में बदलाव होता तो निश्चित रूप से उसका असर सरकार के कामकाज पर होता। उसकी नीतिगत और प्रशासनिक निरंतरता प्रभावित होती। कह सकते हैं कि नई राजनीतिक स्थितियां उभरने के बाद भी प्रधानमंत्री मोदी ने पहली बाधा पार कर ली है।

परंतु सवाल है कि क्या यह स्थिति स्थायी रहने वाली है या गठबंधन की मजबूरियां सरकार के कामकाज पर असर डालेंगी? यह सवाल इसलिए है क्योंकि सहयोगी पार्टियों को उनकी संसदीय ताकत के हिसाब से कम मंत्री पद देने और अपेक्षाकृत कम महत्व के मंत्रालय देने का विरोध हुआ है। यह विरोध बहुत उग्र नहीं है फिर भी कई पार्टियों ने आपत्ति की है और दबी जुबान में ही सही विरोध प्रकट किया है। तभी उनके समर्थन और उनकी चुप्पी को सरकार फॉर गारंटेड नहीं ले सकती है। भले वे सरकार की स्थिरता के लिए खतरा पैदा नहीं करें लेकिन नीतिगत मसले पर सरकार को कठघरे में खड़ा कर सकते हैं और अगर विपक्षी पार्टियां किसी मसले पर मजबूत विरोध दर्ज कराती हैं तो सहयोगी भी इस मौके का इस्तेमाल सरकार पर दबाव बनाने के लिए कर सकते हैं। यह स्थिति स्थायी रहने वाली है। विपक्षी पार्टियां भी सत्तारूढ़ गठबंधन की इस फॉल्टलाइन का इस्तेमाल करने का प्रयास करेंगी।

यह सही है कि सरकार को संख्या के लिहाज से खतरा नहीं है लेकिन वह सहयोगी पार्टियों को एक सीमा से ज्यादा पीछे धकेलने की जोखिम नहीं ले सकती है। अगर सहयोगी पार्टियां जोर देकर कोई बात कहती हैं तो प्रधानमंत्री को उस पर ध्यान देना होगा। जैसे कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने अपने मंत्रालय का कामकाज संभालते हुए कहा कि समान नागरिक संहिता का कानून सरकार के एजेंडे का हिस्सा है वैसे ही जनता दल यू के महासचिव केसी त्यागी ने कहा कि एजेंडा है लेकिन इस पर सबकी सहमति से ही आगे बढऩा है। सो, इस तरह के नीतिगत मसलों पर भाजपा की सहयोगी पार्टियों की बारीक नजर रहेगी।

वैसे भारत की राजनीति में यह कोई नई बात नहीं है। 1989 से लेकर 2014 तक यानी ढाई दशक देश में गठबंधन की सरकार चली और उन सरकारों में जो भी प्रधानमंत्री बना उसने अपने कामकाज की शैली राजनीतिक स्थितियों के अनुरूप ही रखी। प्रधानमंत्री देश हित, क्षेत्रीय आकांक्षा और राजनीतिक मजबूरियों के बीच बारीक संतुलन साध कर चलते रहे। यह अलग बात है कि महज 145 सांसद होने के बावजूद तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जुलाई 2008 में अमेरिका के साथ परमाणु संधि जैसे विवादित नीतिगत मसले को मंजूरी दिलाई।
लेकिन उस दौर के प्रधानमंत्रियों और नरेंद्र मोदी में एक फर्क यह है कि मोदी ने कभी गठबंधन की सरकार नहीं चलाई है, जबकि वीपी सिंह से लेकर चंद्रशेखर, पीवी नरसिंह राव, एचडी देवगौड़ा, आईके गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह गठबंधन से ही प्रधानमंत्री बने थे। उन्होंने अपनी पार्टियों का पूर्ण बहुमत नहीं देखा। सो, वे पहले दिन से गठबंधन की मजबूरियों के साथ चले, जबकि मोदी को पहली बार गठबंधन की मजबूरियों का सामना करना पड़ रहा है। सो, वे किस तरह से परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बैठाते हैं यह देखने वाली बात होगी। यह सही है कि पहले की गठबंधन सरकारों के मुकाबले उनकी सरकार में गठबंधन का नेतृत्व कर ही उनकी पार्टी के पास कुल 82 फीसदी सीटें हैं। इस लिहाज से वे पहले गठबंधन में बने प्रधानमंत्रियों के मुकाबले बेहतर स्थिति में हैं फिर भी दबाव तो उन पर भी आएंगे और मजबूरियां उनके सामने भी आएंगी।

अभी यह पता नहीं है कि कम मंत्री पद देने और कम महत्व के मंत्रालय देने के बावजूद उन्होंने सहयोगी पार्टियों को कैसे समझाया कि वे सरकार का हिस्सा बनें। आने वाले दिनों में इसकी परतें खुलेंगी। सरकार के दोनों बड़े सहयोगी यानी नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू केंद्र में अपने सांसदों को मंत्री बनवाने या उन्हें बड़ा मंत्रालय दिलाने से ज्यादा राज्य में अपनी सरकार की स्थिरता और कामकाज से मैसेज देने की कोशिश करने वाले हैं। इसलिए दोनों की प्राथमिकता राज्य की राजनीति है। दोनों विशेष राज्य के दर्जे की मांग कर रहे हैं और अगर विशेष राज्य का दर्जा नहीं मिलता है तो विशेष आर्थिक पैकेज पर उनका फोकस रहेगा।

क्या प्रधानमंत्री मोदी ने इसका कोई वादा दोनों मुख्यमंत्रियों से किया है? बिहार में अगले साल विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं लेकिन जनता दल यू के नेता समय से पहले चुनाव चाहते हैं। वे बिहार विधानसभा में बड़ी पार्टी बनने की इच्छा रखते हैं। तो क्या केंद्र में कम मंत्री पद देने की भरपाई विधानसभा चुनाव में सीटों की साझेदारी में की जाएगी? क्या भाजपा नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद पर बनाए रखते हुए उन्हें ज्यादा सीटें देकर चुनाव में जाएगी? इसी तरह एक समझौता राज्यसभा की सीटों पर भी होता है। अभी 10 राज्यसभा सांसदों के लोकसभा चुनाव जीत जाने से 10 सीटें खाली हो रही हैं। क्या उसमें सहयोगी पार्टियों को हिस्सेदारी मिलेगी? इसके अलावा राज्यपाल, बोर्ड और निगम, संसदीय नियुक्तियों आदि में भी सहयोगी पार्टियों को ज्यादा हिस्सेदारी मिल सकती है। सरकार वहां सौदेबाजी कर सकती है ताकि प्रधानमंत्री मोदी के तीसरे कार्यकाल में शासन की निरंतरता बनी रहे और अपने घोषित एजेंडे से ज्यादा समझौता नहीं करना पड़े।

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